अराजकता की तरह कुचले नहीं, बल्कि संसार की तरह सामंजस्य से मिले हुए; जहाँ विविधता में क्रम है, और सब भिन्न होकर भी सहमत हैं।
अलेक्ज़ेंडर पोप
अराजकता की तरह कुचले नहीं, बल्कि संसार की तरह सामंजस्य से मिले हुए; जहाँ विविधता में क्रम है, और सब भिन्न होकर भी सहमत हैं।
अलेक्ज़ेंडर पोप