अक्सर ऐसा होता है कि हम उस चीज़ की वास्तविक कीमत नहीं समझते, जब तक कि हमारे पास वह चीज़ होती है। हम उसकी अहमियत तब तक नहीं पहचानते, जब तक कि वह हमसे छीन न जाए या खो न जाए। तभी हम उसकी वास्तविक कीमत का एहसास करते हैं, और तब हम यह समझते हैं कि उस चीज़ में क्या खूबियां थीं, जिन्हें हम उस वक़्त नहीं देख पाए जब वह हमारे पास थी।