कविता
गाँव के गिरजाघर के कब्रिस्तान में शोकगीत · अंश
साँझ की घंटी जाते दिन को विदा कहती है, रंभाता झुंड धीरे-धीरे घास के मैदान से गुजरता है; किसान थके कदमों से घर लौटता है, और संसार को अँधेरे तथा मेरे…
भाग · 1
साँझ की घंटी जाते दिन को विदा कहती है,
रंभाता झुंड धीरे-धीरे घास के मैदान से गुजरता है;
किसान थके कदमों से घर लौटता है,
और संसार को अँधेरे तथा मेरे पास छोड़ जाता है।
धुँधला दृश्य आँखों से ओझल होने लगता है,
हवा में गंभीर सन्नाटा छा जाता है;
बस कहीं भृंग भनभनाता हुआ उड़ता है,
और दूर बाड़े की घंटियाँ ऊँघती-सी बजती हैं।स्रोत और अधिकार
- रचना
- गाँव के गिरजाघर के कब्रिस्तान में शोकगीत
- संस्करण
- अंग्रेज़ी मूल से नया अनुवाद
- अधिकार
- सार्वजनिक डोमेन का मूल पाठ; Typing Ink का नया अनुवाद।
अभ्यास लक्ष्य
- पंक्ति-विराम की लय
- भाग 1यह भाग शुरू करें
साँझ की घंटी जाते दिन को विदा कहती है, रंभाता झुंड धीरे-धीरे घास के मैदान से गुजरता है; किसान थके कदमों से घर लौटता है, और संसार को अँधेरे तथा मेरे पास छोड़ जाता है। धुँधला दृश्य आँखों से ओझल होने लगता है, हवा में गंभीर सन्नाटा छा जाता है; बस कहीं भृंग भनभनाता हुआ उड़ता है, और दूर बाड़े की घंटियाँ ऊँघती-सी बजती हैं।